
श्री विश्वनाथ चालीसा
दोहा
जय विश्वनाथ महेश प्रभु, काशी के रखवाल।
करहु कृपा हे शंभु शिव, हरहु सकल संताप॥
चौपाई
जय जय श्री विश्वनाथ भगवान।
काशी नगरी के तुम रखवाल॥
अविमुक्तेश्वर रूप तुम्हारा।
तीनों लोक में यश है न्यारा॥
गंगा तट पर धाम सुहावन।
ज्योतिर्लिंग अति मनभावन॥
काशी नगरी पावन धामा।
विश्वनाथ है तेरा नामा॥
मस्तक ऊपर चंद्र विराजे।
जटा में गंगा शोभा साजे॥
नीलकंठ त्रिशूल धारी।
डमरू ध्वनि अति सुखकारी॥
नंदीश्वर द्वार पर विराजे।
भक्त तुम्हारे शीश नवाजे॥
ब्रह्मा विष्णु ध्यान लगावें।
देव मुनि सब गुण गावे॥
देवों के भी देव कहाए।
महादेव नाम जगत में पाए॥
जो भक्त तुम्हारा ध्यान लगाता।
मनवांछित फल वह नर पाता॥
दुःख दारिद्र्य दूर करो प्रभु।
सुख-शांति से भर दो प्रभु॥
रोग शोक भय नष्ट करो।
भक्तों के सब कष्ट हरो॥
कालों के भी काल कहाए।
भक्तों के सब भय मिटाए॥
गंगाजल से अभिषेक करावे।
बेलपत्र चढ़ाकर मनभावे॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावें।
हर हर महादेव गुण गावें॥
काशी धाम की महिमा भारी।
महिमा इसकी जग में न्यारी॥
मणिकर्णिका तट पावन।
मोक्षदायिनी भूमि सुहावन॥
प्रातःकाल जो ध्यान लगाए।
विश्वनाथ की कृपा वह पाए॥
संध्या समय दीप जलावे।
सकल मनोरथ सिद्ध करावे॥
सोमवार को पूजन करता।
उसके मन में भय नहीं रहता॥
श्रावण मास में जो ध्यावे।
शिव का परम आशीष वह पावे॥
मन वचन कर्म से जो ध्यावे।
विश्वनाथ की शरण वह पावे॥
जन्म-जन्म के पाप मिटाओ।
भवसागर से पार लगाओ॥
ज्ञान भक्ति का दीप जलाओ।
मन का अंधकार मिटाओ॥
धन-धान्य सुख-शांति प्रदान करो।
भक्तों का जीवन धन्य करो॥
अंत समय जब प्राण पधारे।
शिव अपने चरणों में धारे॥
जो यह चालीसा प्रेम से गावे।
विश्वनाथ का आशीष वह पावे॥
हर संकट से रक्षा करना।
भक्तों पर कृपा सदा ही धरना॥
जय विश्वनाथ त्रिपुरारी।
जय शिव शंकर मंगलकारी॥
दोहा
काशी विश्वनाथ प्रभु, अविनाशी भगवान।
शरण पड़े जो भक्तजन, राखो उनकी आन॥
हर हर महादेव गूँजे, गूँजे जय जयकार।
विश्वनाथ की कृपा से, हो जीवन सुखसार॥
जय श्री काशी विश्वनाथ
हर हर महादेव
