
नवदुर्गा चालीसा
चौपाई
जय नवदुर्गा जग जननी,
सुख संपत्ति दाता दुख हरनी।
नौ रूप तुम्हारे जग जाने,
सुर नर मुनि सब शीश नवावें।
प्रथम शैलपुत्री कहलाओ,
पर्वतराज की तुम हो लाली।
श्वेत वस्त्र पहने हो माता,
वृषभ पर करती हो तुम वासा।
ब्रह्मचारिणी द्वितीय स्वरूप,
तपस्या करती हो तुम अनुरूप।
कर कमंडल अक्षमाला धारी,
भक्तों की करती हो रखवारी।
चंद्रघंटा तृतीय स्वरूप,
मस्तक पर चंद्र करे अनूप।
सिंह पर करती हो तुम सवारी,
दुष्टों को पल में संहारी।
कूष्मांडा चतुर्थ स्वरूप,
अपनी हंसी से करती भूप।
अष्ट भुजाओं वाली माता,
भक्तों की हो भाग्य विधाता।
पंचम रूप स्कंदमाता,
कार्तिकेय की तुम हो माता।
कमल आसन पर हो विराजित,
भक्तों को करती हो सुख प्रदत्त।
षष्ठम रूप कात्यायनी माता,
ऋषि कात्यायन की हो तुम दुहिता।
सिंह पर करती हो तुम सवारी,
महिषासुर मर्दिनी हो भारी।
सप्तम रूप कालरात्रि माता,
दुष्टों का करती हो संहारा।
श्याम वर्ण वाली हो तुम माता,
गले में मुंड माला है सोहता।
अष्टम रूप महागौरी माता,
श्वेत वस्त्र पहने हो तुम माता।
वृषभ पर करती हो तुम सवारी,
भक्तों की करती हो रखवारी।
नवम रूप सिद्धिदात्री माता,
सिद्धि देती हो तुम साक्षात।
कमल आसन पर हो विराजित,
भक्तों को करती हो सुख प्रदत्त।
नौ रूपों की महिमा भारी,
सब देवों ने है बखानी।
जो कोई ध्यावे तुमको माता,
सुख-संपत्ति पाए वो साक्षात।
रोग, शोक, दुख, दरिद्रता,
सब मिट जाते हैं पल भर में।
जो कोई पढ़े यह चालीसा,
माँ दुर्गा की हो उस पर कृपा।
प्रेम से बोलो जय माता दी,
भक्तों की भरती झोली खाली।
दुष्टों का करती हो संहारा,
भक्तों को देती हो सहारा।
जग में तेरा नाम है ऊँचा,
सब देवों में है तेरा रुतबा।
तू ही लक्ष्मी, तू ही काली,
तू ही शारदा, तू ही ज्वाला।
तेरे दर पर जो भी आता,
मनवांछित फल वो पाता।
जगदंबे तू ही है माता,
भक्तों की हो भाग्य विधाता।
तेरी कृपा से सब सुख पाए,
दुख-दरिद्रता कभी न आए।
जो कोई तेरा ध्यान लगाए,
भवसागर से पार हो जाए।
तू ही शक्ति, तू ही माया,
जग में तेरा है छाया।
तेरी लीला अपरंपार,
महिमा तेरी है महान।
सब देवों ने शीश नवाया,
तेरी महिमा का गुण गाया।
नवरात्रि में तेरा पूजन,
करता है मन से जो कोई जन।
उस पर होती है कृपा तेरी,
भर जाती है झोली खाली।
नवदुर्गा की जय हो माता,
भक्तों की हो भाग्य विधाता।
जो कोई पढ़े यह चालीसा,
माँ दुर्गा की हो उस पर कृपा।
॥ इति श्री नवदुर्गा चालीसा संपूर्णम् ॥
