
धूमावती चालीसा
चौपाई
जय जय जय धूमावती माता।
साधक के संकट हरनिहारी नित विधाता॥
प्रातः रूप कुमारी सुखदाई।
मध्यान्ह में प्रौढ़ छवि छाई॥
संध्या में वृद्धा बन विराजे।
मुण्डमाल गल शोभा साजे॥
खट्वांग धारण करहु भवानी।
कपाल जटा संग महा भवानी॥
दैत्य शिर माला गह आभूषण।
भैरव संग तव लीला निर्मल॥
रक्त सुरा हर्षित कर माता।
महिष महा यम रूप दिखाता॥
अस्थि खण्ड करहु रस विलासा।
भीषण हास्य, करहु संहासा॥
डमरु ध्वनि तव गूँजे भारी।
प्रेत संग महाकाल सवारी॥
टणटण घंटा करे निनादा।
भैरवी छवि जगत विख्याता॥
मुण्ड माला शोभे सुहाए।
चण्ड-मुण्ड संहार कराए॥
वाम कान बिम्ब चन्द्र बिराजे।
दक्षिण भानु तेज विराजे॥
नक्षत्र हार जटा विस्तारा।
मुण्ड माला गले उजियारा॥
त्रिशूल करे, नाग सम्हाले।
महाकाल प्रिय, भय न टाले॥
तैल अभ्यक्त वेणी सुहाए।
रासभ वाहन रूप दिखाए॥
श्मशान वासिनी तू जगमाता।
सर्व सिद्धि दे शरण विधाता॥
रुधिर रसना रक्त विलासी।
काली रूप, करो जग वासी॥
महाघोर संकट जब छाए।
तेरी आराधना फलदाई॥
महायुद्ध, रोग, शत्रु संहारे।
मंत्र जाप से सिद्ध निहारे॥
जो यह चालीसा पढ़े ध्याता।
सिद्धि पावे, संकट टल जाता॥
धूमावती कृपा कर, भवसागर से तार।
भक्तन पर अनुकम्पा कर, जग में कर उद्धार॥
