
विट्ठल चालीसा
दोहा
गणपति-गुरु-पद वंदना, करूँ हृदय धरि ध्यान।
विट्ठल-पांडुरंग की, वंदना करूँ महान॥
चौपाई
जय जय विट्ठल पांडुरंगा।
रुक्मिणी-वल्लभ भक्त-संगा॥
कर कटि पर धरे विराजे।
विटे पर खड़े छवि साजे॥
श्याम-वरण तन शोभा भारी।
रूप निरख त्रिभुवन मन-हारी॥
पुण्डलिक के भक्तिवश आये।
विटे पर खड़े प्रभु शोभाये॥
विष्णु-कृष्ण का रूप तुम्हारा।
पंढरपुर में धाम तुम्हारा॥
जो जन तुमको नित ही ध्यावै।
नाम-भक्ति रस सहज वह पावै॥
वारकरी जन गुण गाते।
“विठ्ठल-विठ्ठल” नित गाते॥
चन्द्रभागा तट शोभा पावै।
भक्त-गण नित दरस को धावै॥
जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै।
रोग-शोक भय निकट न आवै॥
आषाढ़ी वारी जो जन धारे।
नाम-भक्ति-सुख प्रभु ता पर वारे॥
दीन-दुखी की सुनत पुकारा।
पल में करते बेड़ा पारा॥
जो जन तुमको शीश नवावै।
नाम-भक्ति-सुख सहज वह पावै॥
संत ज्ञानेश्वर-तुकाराम प्यारे।
नामदेव-एकनाथ दुलारे॥
अभंग-कीर्तन जो जन गावै।
भव-बंधन से वह छुट जावै॥
जो नर निशदिन ध्यान लगावै।
विट्ठल-कृपा सहज वह पावै॥
मंगलकारी विघ्न-विनाशन।
भय-हारी तुम सुख-साधन॥
जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ावै।
ता के सब बिगड़े बन जावै॥
रुक्मिणी-संग शोभा पाते।
भक्तन के सब दुख मिटाते॥
जो यह विट्ठल चालीसा गावै।
नाम-भक्ति रस सहज वह पावै॥
नित प्रति पाठ करे जो कोई।
ता पर कृपा विट्ठल की होई॥
मन-इच्छित फल सब जन पावैं।
नाम-भक्ति-सुख घर लावैं॥
विट्ठल-कृपा जिन पर होई।
ता को कष्ट सतावे न कोई॥
कार्तिकी-एकादशी जो धारे।
नाम-भक्ति-सुख प्रभु ता पर वारे॥
जो सत भाव करे यह सेवा।
रीझत तुरत विट्ठल देवा॥
संकट-मोचन नाम तुम्हारा।
भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥
महिमा तुम्हरी अति अपारा।
वेद-पुराण करत विस्तारा॥
भक्त-वत्सल तुम कहलाते।
नाम-भक्ति से रीझ जाते॥
घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै।
नर-नारी सब तुमको पागै॥
सरल भक्ति का मार्ग दिखाते।
समता-प्रेम जग को भाते॥
दुःख-दरिद्र जो जन पीड़े।
तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥
विट्ठल-स्तुति जो जन गावै।
रोग-शोक सब दूर भगावै॥
पंढरी-वारी की महिमा भारी।
भव-तारण तुम जग-हितकारी॥
नाम-स्मरण की महिमा गाते।
सरल भक्ति जग को सिखलाते॥
जो जन विट्ठल गुण गावै।
पाप-ताप सब दूर भगावै॥
विट्ठल-वंदन जो जन गावै।
इहलोक-परलोक सुख पावै॥
नाम-भक्ति-सुख घर में आवै।
भक्ति-शान्ति-संतोष बढ़ावै॥
भय-संकट सब दूर हटावै।
विट्ठल जो जन नित ध्यावै॥
मोक्ष-मार्ग वह सहज वह पावै।
विट्ठल-नाम जो जन गावै॥
सुख-शान्ति-भक्ति घर में लावै।
प्रेम-समता सब बढ़ावै॥
जय जय जय विट्ठल पांडुरंगा।
भक्त-वत्सल तुम भव-तारण-गंगा॥
दोहा
विट्ठल चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय।
नाम-भक्ति-सुख-शान्ति सब, सहज मिलैं सदाय॥
॥ जय जय विट्ठल पांडुरंग ॥
