
वामन चालीसा
दोहा
जय वामन भगवान प्रभु, विष्णु रूप अवतार।
बलि के यज्ञ में पधारे, हरने जग का भार॥
कश्यप-अदिति के सुत प्रभु, जग के पालनहार।
दीन-दुखी के नाथ हो, करो भक्त उद्धार॥
चौपाई
जय जय वामन रूप धरे।
देव काज हित धरती परे॥
कश्यप ऋषि के पुत्र कहाए।
अदिति माता के सुखदाए॥
भाद्रपद शुक्ल द्वादशी आई।
वामन रूप में प्रभु अवतारी॥
चारों वेद तुम्हारे संग।
मुख पर छाए दिव्य तरंग॥
छत्र कमंडल हाथ विराजे।
ब्राह्मण रूप मनोहर साजे॥
मेखला, दंड धरे कर में।
तेज प्रकाशित तन के अंदर में॥
बलि राजा था दानी भारी।
यज्ञ कर रहा था शुभकारी॥
तीनों लोक पर राज्य जमाया।
देवों का अधिकार मिटाया॥
देव सभी तब शरण तुम्हारी।
कीन्ही प्रभु से विनय हमारी॥
देवों की सुनि करुण पुकारा।
तुमने लिया वामन अवतारा॥
बलि के यज्ञ स्थल पर आए।
देख तुम्हें सब हर्षित पाए॥
बलि ने पूछा कौन हो स्वामी।
किस हेतु आए ब्रह्मचारी॥
माँगो जो कुछ मन में चाहो।
दानी बलि से वर ले जाओ॥
वामन बोले तीन पग धरती।
बस इतनी ही इच्छा मेरी॥
बलि ने हँसकर वचन सुनाया।
तीन पग भूमि दान में पाया॥
शुक्राचार्य ने बात बताई।
वामन विष्णु हैं, दी दुहाई॥
बलि ने फिर भी वचन निभाया।
दान धर्म का मान बढ़ाया॥
प्रथम पग में धरती नापी।
दूसरे में नभ सीमा मापी॥
तीसरे पग को स्थान न पाया।
बलि ने शीश अपना झुकाया॥
शीश पर प्रभु चरण धराए।
बलि को परम धाम पहुँचाए॥
बलि की भक्ति देख मुस्काए।
उसको अपना भक्त बनाए॥
पाताल लोक का राज्य दिया।
सदा प्रभु का संग भी दिया॥
देवों को उनका लोक दिलाया।
धर्म का फिर मान बढ़ाया॥
वामन रूप तुम्हारा प्यारा।
भक्तों को है अति सुखदारा॥
जो तुम्हारा नाम जपता।
संकट उसके दूर हो जाता॥
अहंकार और मोह मिटाओ।
सत्य धर्म का मार्ग दिखाओ॥
धन वैभव और ज्ञान प्रदाता।
तुम हो जग के भाग्य विधाता॥
दीन दुखी की आस तुम्हीं हो।
भक्तों के विश्वास तुम्हीं हो॥
जो नर श्रद्धा से गुण गावे।
वामन प्रभु की कृपा वह पावे॥
मनोकामना पूर्ण हो उसकी।
कृपा रहे श्रीहरि की जिसकी॥
वामन चालीसा जो पढ़े।
उसके संकट दूर हों बड़े॥
प्रभु चरणों में ध्यान लगाए।
जीवन में सुख-शांति पाए॥
जय जय वामन भगवान।
रखना प्रभु भक्तों का मान॥
दोहा
वामन रूप धरे हरि, बलि का मान बढ़ाय।
धर्म सत्य की राह पर, जग को पाठ पढ़ाय॥
जो श्रद्धा से पाठ करे, हरि कृपा वह पाए।
वामन प्रभु की भक्ति से, भवसागर तर जाए॥
॥ श्री वामन भगवान की जय ॥
॥ श्री हरि विष्णु भगवान की जय ॥
