
श्री इंद्र देव चालीसा
दोहा
जय जय इंद्र देव प्रभु, देवराज बलवान।
वज्रधारी मेघपति, करहु भक्त कल्याण॥
ऐरावत पर आरूढ़ हो, शोभित रूप अपार।
शरण पड़े जो भक्तजन, हरहु सकल विकार॥
चौपाई
जय इंद्र देव देवराज।
सुरपति तुम हो सकल समाज॥
स्वर्गलोक के नाथ कहाए।
देव सभी तुमको सिर नवाए॥
वज्र तुम्हारे हाथ विराजे।
शत्रु दलन में तेज विराजे॥
ऐरावत गज वाहन प्यारा।
शोभित रूप तुम्हारा न्यारा॥
इंद्रधनुष नभ में जब छाए।
मेघ तुम्हारे संदेश सुनाए॥
वर्षा करके धरा सजाते।
जीव-जगत को तृप्त कराते॥
अन्न-धान्य की वृद्धि कराते।
सूखी धरती हरी बनाते॥
देवगणों के तुम रखवाले।
संकट हरते भक्तन वाले॥
शची देवी संग राज तुम्हारा।
स्वर्गलोक में यश है न्यारा॥
सुर-मुनि नित ध्यान लगावें।
इंद्र देव की महिमा गावें॥
अश्वमेध यज्ञों में पूजे।
भक्त तुम्हारे संकट बूझे॥
जब-जब दानव बल बढ़ जाता।
देवों का संकट बढ़ जाता॥
तब तुम वज्र उठाकर आते।
धर्म की रक्षा कर दिखलाते॥
वृत्रासुर का किया संहारा।
देवों को दिया सुख अपारा॥
वर्षा के तुम देव कहाए।
मेघों के स्वामी कहलाए॥
जल से जीवन देते हो प्रभु।
धरती का श्रृंगार करो प्रभु॥
किसान तुम्हारी आस लगाते।
वर्षा पाकर सुखी हो जाते॥
जो भक्त तुम्हें मन से ध्यावे।
उसके मन में साहस आवे॥
दुःख-दरिद्रता दूर भगाओ।
जीवन में सुख-शांति लाओ॥
धन-धान्य और यश प्रदान करो।
भक्तों का कल्याण करो॥
भय संकट सब दूर करो।
शरणागत की रक्षा करो॥
सत्य धर्म के मार्ग चलाओ।
मन में शुभ विचार जगाओ॥
प्रातःकाल जो ध्यान लगावे।
इंद्र देव की कृपा वह पावे॥
श्रद्धा से जो नाम जपावे।
मनवांछित फल प्राप्त करावे॥
जो यह चालीसा नित गावे।
इंद्र देव का आशीष पावे॥
घर में सुख-समृद्धि आए।
सकल विपत्ति दूर हो जाए॥
जय जय इंद्र देव सुखदाता।
जय देवराज जगत विधाता॥
कृपा करो हे मेघपति।
रखो भक्तों की सदा लाज॥
दोहा
इंद्र देव की चालीसा, जो नर प्रेम से गाए।
वर्षा, सुख-समृद्धि मिले, संकट दूर हो जाए॥
वज्रधारी देवराज प्रभु, करहु कृपा अपार।
शचीपति इंद्र देव जी, रखियो भक्तों की लाज॥
॥ इति श्री इंद्र देव चालीसा सम्पूर्ण ॥
॥ जय श्री इंद्र देव ॥
