
अग्नि देव चालीसा
दोहा
अग्नि देव जगत पिता, सृष्टि के आधार।
यज्ञ हव्य सब तुमसे, होत सुख अपार॥
चौपाई
अग्नि देव प्रथम पूज्य, ऋषि मुनि जिन गाया।
वेदों में तुम्हारा गुण, सबने सुनाया॥
पुरोहित यज्ञ के तुम, होता सुखदायी।
रत्न धाता तुम हो, सबके मन भायी॥
पूर्व ऋषि जिन तुमको, सदा पूजा किया।
नव युग में भी तुम्हें, सबने मान लिया॥
देवताओं के तुम हो, सबके प्रिय सखा।
सबको सुख देना तुम, हो यही वरदान॥
अग्नि देव तुम्हारे बिन, यज्ञ अधूरा रहे।
तुमसे ही सब पोषण, जगत को मिले॥
यश और वीरता तुम, सबको देना हो।
तुम्हारे प्रताप से ही, सबका कल्याण हो॥
विश्व के यज्ञ तुमसे, सदा पूर्ण होते।
देवताओं तक पहुंचे, हव्य सब लेते॥
कवि क्रतु तुम हो प्रभु, सत्य के धाम।
देवों के साथ तुम्हें, सदा माना महान॥
जो भक्त तुम्हें पूजे, सुख पाता अपार।
तुम उस पर कृपा करो, हो जाए उद्धार॥
दिवस रात तुम्हारा, सबको है साथ।
तुम्हारे प्रकाश से ही, होता जगत प्रकाश॥
यज्ञों के राजा तुम, अमृत के दाता।
तुम्हारे तेज से ही, होता जगत त्राता॥
स्वयं के घर में तुम, सदा वर्धमान।
तुम्हारे प्रताप से ही, होता सब कल्याण॥
पिता समान तुम हो, सबके हितकारी।
सुखदायी तुम हो प्रभु, सबके दुख हारी॥
तुम्हारे साथ रहकर, होता सबका कल्याण।
तुम्हारे प्रताप से ही, होता सबका मान॥
दोहा
अग्नि देव की चालीसा, जो कोई नित पढ़े।
सुख-समृद्धि उसके घर, सदा बढ़े ही बढ़े॥
॥ इति श्री अग्नि देव चालीसा सम्पूर्ण ॥
॥ जय अग्नि देव ॥
