
श्री कन्याकुमारी चालीसा
दोहा
जय श्री कन्याकुमारी, त्रिसमुद्र निवासिनी।
बाणासुर संहारिणी, भवदुःख नाशिनी॥
कन्या रूप धरी जग में, भक्तन की त्राण।
तारक नाम जपे जो, तर पाए भव पान॥
॥ चौपाई ॥
जय श्री कन्याकुमारी, जगत की नायिका।
तीर्थराज त्रिवेणी जल, तव स्थान मति मायिका॥
दक्षिण सीमा अंत्य भूमि, भारत के अंत।
शक्तिपीठ महातपस्या, जहाँ पार्वती संत॥
भगवती नाम तिहारो, कुमारी रूप धरी।
शिव-पार्वती मिलन की, बनी तू तपस्या हरी॥
नारद जी के वचन सुनी, शिव वर चितवन लागी।
शिव तिहारे विवाह के, सब सिद्धि करी भागी॥
नारद जी समय जानी, मुर्गा बोले भोर।
शिव फिरे तिहारे लागे, विवाह भया अंत छोर॥
कन्या रूप तू ही रहिन, शिव त्याग गयो लाग।
बाणासुर के वध हेतु, भगवती हुई जग॥
वरदान पाया बाणासुर, बलहीन बल जीत।
देवता जब हारि गए, तब तू ही रची प्रीत॥
रत्नम मुकुट किरीट ताज, भयंकर रूप धरी।
भयंकर रूप देखि, बाणासुर मन डरी॥
खड्ग पाणि तिहारे हाथ, असुर संहार करे।
बाणासुर का शीश काट, क्षण में ही छिन्न करे॥
तिहारे भक्तन सों कष्ट, तू हरि लेती सदा।
नाम तिहारे जपे नर, मुक्ति पद पावे बड़ा॥
कन्या कुमारी तेरो नाम, पुराणन में गही।
तीर्थराज त्रिवेणी संगम, त्रिभुवन पवित्र रही॥
कन्याकुमारी धाम तिहारो, तीर्थ निधान महान।
गंगा यमुना सरस्वती, पुण्य समुद्र समान॥
सूर्य उदय अस्त पासे, दर्शन लाभ अपार।
चंद्र उदय तिहारे, जल में होत सुहाग॥
नाथ नूपुर तिहारे, सागर नदियाँ रमावैं।
भक्तन के भाग्य बढ़ावैं, कल्याण सभी पावैं॥
श्री राम जय जय श्री राम, श्री कन्या कुमारी।
श्री भवानी शिव पार्वती, जगत जननी तिहारी॥
देव दानव ऋषि मुनि, सब नत होत नित भाव।
शक्ति रूप तू ही अनूपा, त्रिभुवन में तेरा प्रभाव॥
काल महाकाल संहारिणी, भक्तन की शरण।
जो यह पढ़े नित भाव से, निर्भय हो जीवन॥
कन्याकुमारी चालीसा, जो कोई जपे लगन।
सो अनुरागी भक्त तिहारो, पावे सुख-संपन्न॥
त्रिवेणी संगम कर स्नान, दर्शन करै हृदय।
तेहि परम पद पावे नर, कल्याण होवै सदैव॥
भवसागर तारण हेतु, तू ही रची अवतार।
करो अनुग्रह मोहि पर, रखो सदा शरण द्वार॥
॥ दोहा ॥
त्रिसमुद्र में विराजत, श्री कन्याकुमारी।
भक्तन कष्ट हरि लेत, करो कृपा मोहि तारी॥
